Saturday, 14 June 2014

‘दो पुराने से लोग’ (यादों का इडियट बॉक्स विद नीलेश मिस्रा)


तुम

तुम
अपनी चाय में शक्कर बहुत लेती हो
मैं बिना चीनी की ब्लैक कॉफ़ी पीता हूं
जब हम अपने अपने कप लिये
एक दूसरे के साथ बैठते हैं
मैं चुपचाप गिनता हूं
तुमने कितनी चम्मच शुगर डाली है कप में.....


इतनी शुगर कैसे अच्छी लगती है तुम्हें!
इतनी शुगर का करती क्या हो तुम?
चम्मच, चीनी और तुम्हें सोचता हुआ
मैं अपनी कॉफ़ी पीता हूं
जो मुझे मीठी लगती है!


तुम टैलेपैथी से बताती हो –
“मैं तुम्हारे जीवन में शक्कर घोल रही हूं!”

मुझे

मुझे
बस उतनी ही आती है तुम्हारी याद
जितनी धूप,
ज़ब्त किये है सूरज ख़ुद में
तब से ही
जब धरती उससे ज़ुदा हुई थी!

मैं भी,
जिस दिन से तुम से मिलके लौटा हूं
सूरज सा धधक रहा हूं!

लाखों प्रकाशवर्ष सी दूरी है दो शहरों में
करोड़ों साल नुमा लम्हें बीत चुके हैं!

Wednesday, 11 June 2014

आखिरकार वो दिन आ गया.


आखिरकार वो दिन आ गया. वो अपने प्लैटफ़ॉर्म पर आ गया. गाड़ी में बैठ भी गया. उसका ट्रांसफर होना था. कब से टिकिट कटाकर इस दिन का इंतज़ार कर रहा था! प्लैटफ़ॉर्म वाली भीड़ को देखा – कैसे घूर रहे हैं उसे! बेवकूफ़ हैं सारे के सारे!    

बस जी, यही दिन है, जो इस स्टेशन से उस स्टेशन लेकर जायेगा. ये आखिरी प्लैटफ़ॉर्म एक आखिरी सफ़र फिर यहां कौन मुड़ के आयेगा. चलो, यार निकलते हैं! पर्दे के पीछे जाने क्या-क्या रखा है! डोरी हिलने लगी है. बस अभी खुल जाती है! बड़े बाबू का काम किया है अपन ने, बिना बड़े बाबू के कहे! उनकी पुरानी फ़ाइल देखकर ही अपने आप हिसाब बैठा लिया. अपने खाते में नयी एंट्री देखेंगे तो क्या खुश हो जायेंगे!    

लेकिन एक बात अच्छी नहीं हुई. उसे ख़याल आ गया कि कहीं अगर ट्रेन सही स्टेशन ना लेकर गयी तो? घूम के इस प्लैटफ़ॉर्म पर तो वापस आने से रही! गाड़ी छूटी तो शक़ पुख़्ता हुआ कि ये नींद वैसी नहीं है जैसी रोज़ आया करती है. जिन्होंने उसकी अर्जी बड़े बाबू के आगे लगायी थी उन्होंने अगर कोई नादानी या चालाकी की होगी तो? गलतियां इंसानों से हो भी जाती भी और इंसान जानबूझ कर करते भी हैं. अगर बड़े बाबू ने ही कह दिया कि – बेवकूफ़! मेरी उधारी या लड़ाई मैं ख़ुद सुलट सकता हूं. मेरे काम में तूने टांग अड़ाई ही क्यों? – तो?     

और इस तरह मरने से ठीक पहले उसके मन में ‘अगर’ आ गया! गले की रस्सी ने पोस्टमार्टम में इस बात की गवाही दी है कि इसी सदमे ने उसकी जान ले ली.


- एक कसाब की साइको-कहानी 

Thursday, 7 March 2013

बाऊजी








आशिक़ जी गया उस एक सहारे ही


आशिक़ जी गया उस एक सहारे ही
उसकी तरफ़ देखकर जो ज़ुल्फ़ संवार ली.

ज़ुल्फ़ जो रह जाती उनके संवारे ही
तिरछी नज़र कर देती काम तमाम पूरा.

तिरछी नज़र के बीच हंसते-हंसाते ही
दिल में छुरी धंसाने की रिवायत निभा ली.

छुरी अपने हुस्न की दिल पर चलाते ही
किया वो भी क़त्ल इश्क़ जो बाकियों से किया.

इश्क़ कर बैठे हम बिन-पूछे बिन-बताये ही
गज़ल करें पहले या उनसे ही कहें.

हम ना जीते तो क्या वो भी तो हारे ही
आशिक़ ही ना रहे तो महबूब किस बात का. 

Monday, 4 March 2013

ये नहीं कि तुझको चाहता नहीं हूं

ये नहीं कि तुझको चाहता नहीं हूं
तूने पूछा नहीं है, बताता नहीं हूं.

कभी-कभी मेरी खामोशी ही सुन लिया कर
ऐसा भी क्या ताना पुकारता नहीं हूं.  

खार भी खाता हूंख़फ़ा भी होता हूं
तू कहता है प्यार जताता नहीं हूं.

मेरा ज़ख्म मुझको अजीज़ बहुत है
दुखे कितना ही मरहम लगाता नहीं हूं.


आंखों को तो अब सुराही कर लिया है
इनमें जो पानी है छलकाता नहीं हूं.  


चलूंगा तब साथ में इक रिवाज़ चल पड़ेगा
दस्तूर पुराने मैं यूं भी निभाता नहीं हूं.